भारत छोडो आन्दोलन: भारत के इतिहास का सबसे सफल आंदोलन

1857 में जो जंग-ए-आजादी शुरू हुई थी, 9 अगस्त 1942 में वह अपने अंतिम पड़ाव में पहुंच चुकी थी। जिन समाजिक बिखरावों के कारण पूर्व के सभी संघर्ष असफल हो गए थे, महात्मा गांधी ने उन्हें दूर कर दिया था और ये उनका ही जादू था कि करोड़ों भारतीय आजादी के लिए सड़कों पे उतर आये थे। बच्चे-बच्चे ने ‘करो या मरो’ के संकल्प को आत्मसात कर लिया था, समूचे देश में उस समय यही जनून था कि अंग्रेजों या तो हमारा देश छोड़ दो या फिर हमारा कत्ल कर दो। चलिए आज इस भारत छोडो आन्दोलन के 74 वर्ष पुरे होने के अवसर पे इसकी कहानी को विस्तार से दोहराते हैं।

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“मैं एक ही चीज लेने जा रहा हूं, आजादी। अगर नहीं देना है तो कत्ल कर दो। आपको एक ही मंत्र देता हूं, करेंगे या मरेंगे। जिनमें कुछ कर गुजरने की ताकत है, वही जिंदा रहते हैं।”

8 अगस्त 1942 की रात को कांग्रेस महासमिति की बैठक में महात्मा गांधी ने उपरोक्त शब्द कहे थे जो बाद में भारत के इतिहास के अहम दस्तावेज बन गए। उस बैठक में गांधी जी ने करीब तीन घंटे अंग्रेजी और हिंदी में लंबा भासन दिया था और इस तीन घंटे पुरे हॉल एक अजीब सा सन्नाटा छाया हुआ था, ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो उनका एक-एक शब्द संपूर्ण देश को अंदर से झकझोड़ रहा था, उतेजित कर रहा था। महात्मा गांधी की सबसे बड़ी सफलता तो यही थी की उन्होंने आजादी की लड़ाई को एक सीमित दायरे से निकाल कर पुरे भारतवर्ष में फैला दिया और जन-जन को इससे जोड़ दिया, इस भारत छोडो आन्दोलन ने गांव के एक साधारण किसान को भी उतना ही उद्वेलित किया जितना किसी शहर में रहने वाले किसी व्यक्ति को। इस चेतना का प्रमाण तो इसी बात से मिलता है की भारत छोड़ो आन्दोलन में ग्रामीण तबकों की भागीदारी साठ प्रतिशत से अधिक थी और इसी के कारण यह आन्दोलन संपूर्ण आजादी की लड़ाई में सबसे गरिमामयी स्थान रखता है।

आखिर भारत छोडो आन्दोलन का उद्देश्य क्या था?

भारत छोडो आन्दोलन का प्रमुख उद्देश्य जन-मानस में जागृति लाना था, तभी तो इस आन्दोलन के पांच वर्ष के भीतर ही हमे आजादी मिल गयी। इस आन्दोलन में बड़ी संख्या में युवाओं को आकर्षित किया था, युवा कॉलेज के बजाय जेल जाना ज्यादा पसंद कर रहे थे। इस आन्दोलन ने अंग्रेजी हुकूमत की जड़े हिला कर रख दी और उसे इसे दबाने में सालभर से भी ज्यादा का वक़्त लग गया। सन 1942 का भारत छोड़ो आन्दोलन अंग्रेजी राज जे विरुद्ध भारतियों का निर्णायक संग्राम साबित हुआ। महात्मा गांधी की ललकार पर लाखों भारतवासी ‘करो या मरो’ का मंत्र लेकर आजादी की लड़ाई में अपना योगदान देने घरों से निकल सड़को पे उतर आये। इस आन्दोलन में सबसे अधिक बलिदान युवाओं ने ही दिया था।

कैसे सफल हुआ भारत छोडो आन्दोलन ?

भारत छोडो आन्दोलन महात्मा गांधी की सोची समझी रणनीति थी। दरअसल, दृतीय विश्व युद्ध में इंग्लैंड को उलझा देख जैसे ही नेताजी ने आजाद हिंद फौज को ‘दिल्ली चलो’ का नारा दिया, महात्मा गांधी ने भी मौके की नजाकत भांपते हुए 8 अगस्त की रात में बम्बई से भारत छोड़ो आन्दोलन का आहान कर दिया। अंग्रेजों ने भारत छोडो आन्दोलन को दबाने के विचार से महात्मा गांधी को पुणे के आगा खान पैलेस में नजरबंद कर दिया मगर एक छोटे कद और ऊंचे इरादों वाले व्यक्ति लालबहादुर शास्त्री ने इसे व्यापक रूप दे दिया। इस आन्दोलन के लिए 9अगस्त का दिन भी एक सोची-समझी रणनीति थी, 6 अगस्त 1925 को ब्रिटिश हुकूमत का तख्ता पलट के उद्देश्य से रामप्रसाद बिस्मिल के नेतृत्व में हिंदुस्तानी प्रजातंत्र संघ के दस जुझारू क्रांतिकारियों ने ‘काकोरी कांड’ को अंजाम दिया था। इस कांड की याद को जनमानस के हृदय में ताजा रखने के लिए शहीद भगत सिंह ने हर साल 9अगस्त को काकोरी कांड स्मृति-दिवस मानाने की परंपरा की शुरुआत की थी और इस बहुत सारे युवा आजादी की लड़ाई में अपना सर्वस्व कुर्बान कर देने का संकल्प लेते थे और आमजन से इस दिन के इसी खास जुड़ाव के कारण आन्दोलन के लिए इसी दिन का चुनाव किया गया।

भारत छोडो आन्दोलन का क्या असर दिखा था ?

जैसा मैंने पहले भी कहा की भारत छोडो आन्दोलन का व्यापक असर हुआ था। अगर उस समय के सरकारी आंकड़ो की माने तो इस आन्दोलन में 942 लोग मारे गए, 1630 घायल हुए, 18000 लोग नजरबंद किये गए और 60229 लोगों ने गिरफ्तारियां दी थीं। 9 अगस्त को जब पुरे देश में ठीक से सुबह का उजाला भी नहीं फैला था तब तक कांग्रेस कार्यसमिति के सभी सदस्य गिरफ्तार किये जा चुके थे और कांग्रेस को गैरकानूनी घोसित किया जा चूका था। 19 अगस्त को शास्त्री जी भी गिरफ्तार हो गए लेकिन तब तक उन्होंने अपना काम कर दिया था। गांधी जी के साथ भारत कोकिला सरोजिनी नायडू को यरवडा, पुणे में स्थित आगा खान पैलेस में नजरबन्द रखा गया, डॉ. राजेंद्र प्रसाद को पटना के बांकीपुर जेल और अन्य सभी महत्वपूर्ण नेताओं को अहमदनगर के किले में नजरबंद किया गया था।

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तो ये था भारत छोड़ो आन्दोलन का इतिहास, मुझे अब ये लेख समाप्त कर देना चाहिए था मगर लिखते-लिखते मन में एक ख्याल आ गया। मैं सोच रहा था की वक्त कितना बदल चूका है, ये वो समय था जब युवा देश के लिए समर्पित थे लेकिन अब आज का युवा वर्ग देशप्रेम और देशसेवा कि बात नहीं करता है क्योंकि उन्हें ये ‘कूल’ और ‘ट्रेंडी’ नहीं लगता। आप इस बात से सहमत हो या ना हों परन्तु मुझे लगता है की कहीं ना कहीं हमारे नैतिक और सामाजिक मूल्यों का ह्रास हुआ है और इसके जिम्मेदार भी हम स्वयं हैं। खैर, मैं ये भी मानता हूं की वक्त बदलेगा, सोच बदलेगी, हम एक और आजादी की लड़ाई लड़ेंगे, खुद के स्वार्थों से आजादी की लड़ाई।
जय हिन्द।

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