पितृ पक्ष में तर्पण करने के महत्व के पीछे रिवाज नहीं, बल्कि पितरों के प्रति गहरी श्रद्धा है

सुनने में आता है कि शाहजहां को जब उसके बेटे औरंगज़ेब ने कैद कर रखा था, तो उसने एक दफ़ा औरंगज़ेब से कहा था कि हिंदू तो अपने मरे हुए बुजुर्गों का भी आदर करते हैं, लेकिन तूने तो अपने ज़िंदा वालिद का ही निरादर किया है.
ओ प्लीज़… बात को यहां हिंदू और मुस्लिम से ना जोड़ें. इस वाक़ये के बारे में ज़िक्र करना बस इसलिए ज़रूरी था, क्योंकि हम यहां पितृ पक्ष की बात करने जा रहे हैं.

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आखिर क्या होता है पितृ पक्ष?

भारतीय महीनों की गणना के अनुसार, शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को गणेश महोत्सव के बाद भाद्र पक्ष माह की पूर्णिमा से ही पितृ पक्ष की शुरुआत हो जाती है. अपने पितरों के प्रति श्रद्धा और सम्मान दिखाने के लिए ये महापर्व मनाया जाता है. इसे महापर्व इसीलिए बोला जाता है क्योंकि ये सोलह दिनों तक चलता है. शास्त्रों में ये कहा गया है कि जिस प्रकार से शरीर बैकबोन से टिका हुआ है, उसी प्रकार इंसान की बैकबोन उसके पूर्वज हैं. पूर्वजों को याद रखने के लिए यह महापर्व मनाया जाता है. उनका धन्यवाद करने और उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करने के लिए पितृ पक्ष का महत्व है.

हिंदू समाज में क्यों है इसका महत्व?

हिंदू शास्त्रों अथवा पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, पितृ पक्ष के दौरान हमारे पूर्वज किसी ना किसी रूप में हमारे निकट आते हैं. इस पर्व में अपने पितरों का मान-सम्मान करने के लिए उनका श्राद्ध किया जाता है. पितरों की आत्मा की शांति के लिए पौत्र या फिर पुत्र द्वारा श्राद्ध करवाया जाता है. पितृ पक्ष में माता-पिता अथवा पूर्वजों के श्राद्ध के कारण शुभ कार्यों की मनाही रहती है, मसलन मकान खरीदना या फिर वाहन खरीदने की मनाही रहती है.

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गरुड़ पुराण में तो इस बात का ज़िक्र भी मिलता है कि श्राद्ध और तर्पण से पितरों को तृप्ति मिलती है. इसी कारण इस महापर्व में पितरों का श्राद्ध और तर्पण किया जाता है. कहा जाता है कि इंसान के जीवन का मूल सुख धन और पुत्र भी पूर्वजों के आशीर्वाद से ही मिलता है. इसलिए पितृ पक्ष के दौरान लोग अपने पितरों को तर्पण करके प्रसन्न करते हैं अथवा उनसे आशीर्वाद की कामना करते हैं.

Pitra Tarpan ritual

कब करना चाहिए श्राद्ध?

परपंरा के अनुसार, गर देखा जाये तो दोपहर 12 बजे के आस-पास श्राद्ध करना ठीक रहता है. किसी सरोवर या नदी के किनारे के अलावा अपने घर में भी श्राद्ध किया जा सकता है. पितरों के लिए भात, काले तिल और घी का मिश्रण बनाकर पिंड दान किया जाता है. इस प्रक्रिया के बाद विष्णु भगवान और यमराज की पूजा की जाती है. हिंदू समाज में अपनी तीन पीढ़ी तक के पूर्वजों की पूजा-अर्चना करने की मान्यता है. अपने पूर्वजों का पसंदीदा पकवान बनाकर ब्राह्मण को भोजन करवाया जाता है. उचित दक्षिणा, फल और सम्मान के साथ उन्हें विदा कर उनका आशीर्वाद लिया जाता है. इसके अलावा यह भी एक मान्यता है कि कौवे और पक्षियों द्वारा श्राद्ध का भोजन ग्रहण करना, सही मायने में पितरों को प्राप्त होता है. मान्यता ये है कि पक्षी पितरों के विशेष दूत होते हैं. गौर करें कि पितृ पक्ष के दौरान घर में प्याज, लहुसन और तामसिक भोजन से पूर्णत: परहेज किया जाता है.

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विष्णु पुराण में तो ये भी लिखा है कि पितरों को अलग-अलग प्रकार के व्यंजनों की भूख नहीं होती, बल्कि वो तो भावना के भूखे होते हैं. आप उन्हें जो भी श्रद्धा से देंगे, वो उसे ही स्वीकार कर लेंगे. इसके अलावा गर किसी को अपने माता-पिता, दादा-दादी के इंतकाल की तिथि पता नहीं है, तो वो अमावस के दिन श्राद्ध कर सकता है.

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