होलाष्टक:क्यों है आठ दिन शुभ कार्य निषेध – Holashtak: Why to neglect auspicious work for Eight days?

होलाष्टक:क्यों है आठ दिन शुभ कार्य निषेध – Holashtak: Why to neglect auspicious work for Eight days?

होलाष्टक (होली+अष्टक) शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है, जिसका अर्थ है होली के आठ दिन। होलाष्टक फाल्गुन शुक्ल पक्ष अष्टमी से शुरू होकर फाल्गुन शुक्ल पक्ष

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होलाष्टक (होली+अष्टक) शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है, जिसका अर्थ है होली के आठ दिन। होलाष्टक फाल्गुन शुक्ल पक्ष अष्टमी से शुरू होकर फाल्गुन शुक्ल पक्ष पूर्णिमा तक रहता है। क्योकि यह अष्टमी तिथि से शुरू होता है इसलिए इसे होलाष्टक कहते हैं। असल में होली के आने की पूर्व सूचना होलाष्टक से ही प्राप्त होती है। इसी दिन से होली उत्सव के साथ-साथ होलिका दहन की तैयारियां भी शुरू हो जाती है। यह 8 दिनों का होता है और इस दौरान किसी भी तरह के शुभ और मांगलिक कार्य वर्जित होते हैं।

आइये जानते हैं होलाष्टक का महत्व और इसे मानाने का कारण-

ग्रहों की उग्र दशा :-

होलाष्टक के दौरान सभी ग्रह उग्र स्वभाव में रहते हैं जिसके कारण शुभ कार्यों का अच्छा फल नहीं मिल पाता है। ऐसा इस कारण से कहा जाता है, क्योकि अष्टमी को चंद्रमा, नवमी को सूर्य, दशमी को शनि, एकादशी को शुक्र, द्वादशी को गुरु, त्रयोदशी को बुध, चतुर्दशी को मंगल और पूर्णिमा को राहू उग्र स्वभाव में रहते हैं। और इस वर्ष पूर्णिमा और चतुर्दशी एक ही दिन है जिस कारण मंगल और राहु एक ही दिन अत्यधिक उग्र होंगे। जिसका प्रभाव अनेक राशियों पर पड़ेगा। इन ग्रहों के उग्र होने के कारण मनुष्य के निर्णय लेने की क्षमता कमजोर हो जाती है जिसके कारण कई बार उससे गलत निर्णय भी हो जाते हैं और हानि की आशंका बढ़ जाती है।

होलाष्टक की तिथि :-

इस वर्ष होलाष्टक के ये आठ दिन दिनांक 23 फरवरी 2018 से प्रारंभ हो रहे हैं जो कि 1 मार्च 2018 को समाप्त होंगे। मानव मस्तिष्क पूर्णिमा से 8 दिन पहले कहीं न कहीं क्षीण, दुखद, अवसाद पूर्ण, आशंकित और निर्बल हो जाता है। भारतीय मुहूर्त विज्ञान और ज्योतिष शास्त्र के अनुसार प्रत्येक कार्य शुभ मुहूर्त का शोधन करके करना चाहिए। यदि कोई भी कार्य शुभ मुहूर्त में किया जाता है तो वह उत्तम फल प्रदान करता है।

शुभ कार्य निषेध :-

प्रत्येक कार्य की दृष्टि से उसके शुभ समय का निर्धारण किया गया है। जैसे गर्भाधान, विवाह, पुंसवन, नामकरण, चूड़ाकरन विद्यारम्भ, गृह प्रवेश व निर्माण, गृह शान्ति, हवन यज्ञ कर्म, स्नान, तेल मर्दन आदि कार्यों का सही और उपयुक्त समय निश्चित किया गया है। इस प्रकार होलाष्टक को ज्योतिष की दृष्टि से एक दोष माना जाता है जिसमें विवाह, गर्भाधान, गृह प्रवेश, निर्माण, आदि शुभ कार्य वर्जित हैं। इस समय विशेष रूप से विवाह, नए निर्माण व नए कार्यों को आरंभ नहीं करना चाहिए। अर्थात् इन दिनों में किए गए कार्यों से कष्ट, अनेक पीड़ाओं की आशंका रहती है तथा विवाह आदि संबंध विच्छेद और कलह का शिकार हो जाते हैं या फिर अकाल मृत्यु का खतरा या बीमारी होने की आशंका बढ़ जाती है।

होलाष्टक मानाने का कारण :-

मान्यता है कि भक्त प्रह्लाद की अनन्य नारायण भक्ति से क्रुद्ध होकर हिरण्यकश्यप ने होली से पहले के आठ दिनों में प्रह्लाद को अनेकों प्रकार के जघन्य कष्ट दिए थे। जिससे एक एक कर के सभी गृह रुष्ट हो गए और अपने उग्र रूप में आ गए। तभी से भक्ति पर प्रहार के इन आठ दिनों को हिंदू धर्म में अशुभ माना गया है। ऐसा माना जाता है कि होलिका से पूर्व 8 दिन दाह-कर्म की तैयारी की जाती है। यह मृत्यु का सूचक है। इसके कारण होली के पूर्व 8 दिनों तक कोई भी शुभ कार्य नही होता है।  Suorce Bhakti Darshan

क्या करते हैं होलाष्टक में :-

होलाष्टक प्रारंभ होते ही होलिका दहन वाले स्थान की गोबर, गंगाजल आदि से लिपाई की जाती है। इस स्थान पर होलिका दहन के लिये लकडियां एकत्र करने का कार्य किया जाता है। होलाष्टक से लेकर होलिका दहन के दिन तक प्रतिदिन इसमें कुछ लकडियां डाली जाती है।

होलिका दहन के दिन तक यह लकडियों का बडा ढेर बन जाता है। साथ ही वहां पर दो डंडे स्थापित किये जाते हैं, जिसमे से एक भक्त प्रह्लाद का और एक होलिका का सूचक होता है। होलिका दहन के दिन इन लकड़ियों के ढेर में आग लगाई जाती है, और उस आग में स्थापित दोनों डंडों को भी डाला जाता है, फिर इसमें से प्रह्लाद के सूचक डंडे को निकल लिया जाता है तथा होलिका का दहन किया जाता है। इस प्रकार होलिका दहन में प्रभु भक्त प्रह्लाद के बचने का उत्सव मनाया जाता है।

होलाष्टक का अंत धुलेंडी के दिन रंगों के साथ होता है, तथा इस दिन से शुभ कार्य भी आरम्भ हो जाते हैं।

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