जानिए रियल ‘पैडमैन, मुरूगनंतम’ की कहानी !

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एक बहुत हैरान करने वाले सर्वे में पता चला है की भारत में 80% महिलाएं  सैनिटरी नैपकिन का प्रयोग नहीं करती हैं। ये उस देश का हाल है जहां आये दिन महिला सशक्तिकरण की चर्चाएं होती हैं। पर महिलाओं से जुडी ये एक ऐसी समस्या  है  जिसके बारे में लोग चर्चा करने में भी दिलचस्पी नहीं लेते। और हमारे समाज में महिलाएं अपनी तकलीफों को नज़रअंदाज़ करने में तो एकदम परफेक्ट हो चुकीं हैं।

पर ऐसे ही एक समाज से उठ कर इस समस्या पर गौर किया इस पैडमैन ने जिस से प्रेरित हो कर अब अक्षय कुमार की फिल्म ‘पैडमैन ‘आने वाली है। इनका नाम है ‘अरूणाचलम मुरूगनंतम’, इनका  जन्म एक गरीब परिवार में हुआ था। बचपन में ही इनके पिता का निधन एक सड़क दुर्घटना में हो गया था।

14 साल की उम्र में स्कूल से निकाले जाने के बाद घर चलाने के लिए  तरह-तरह की नौकरियाँ की। अरूणाचलम मुरूगनंतम का विवाह 1998 में हुआ। एक दिन जब मुरूगनंतम दोपहर का खाना खाने के बाद बैठकर आराम कर रहे थे, तब उन्होंने देखा कि उनकी पत्नी उनसे कुछ छिपा कर ले जा रही हैं। तब अरूणाचलम मुरूगनंतम ने पुछा की वो क्या छिपा रही हैं, उनकी पत्नी ने जबाब दिया ये आपके मतलब का नही हैं। तब मुरूगनंतम ने एक बहुत ही गन्दा कपड़ा उनके हाथों में देखा, वे समझ गये कि इन कपड़ो का इस्तेमाल उनकी पत्नी ने पीरियडस के दौरान किया हैं।

तब उन्होंने अपनी पत्नी से पूछा कि सेनेटरी  नैपकिन (पैड) का  प्रयोग क्यों नही करती हो यह तरीका ठीक नहीं हैं इससे तुम बीमार हो सकती हो। तब उनकी पत्नी ने कहा कि अगर मैं नैपकिन प्रयोग करुँगी तो घर के खर्चो पर इसका असर पड़ेगा। ये बात उनके दिल में घर कर गयी और उन्होंने अपने मन में ही सस्ते नैपकिन बनाने की ठानी, जिससे की किसी भी गरीब की जेब पर ज़्यादा बोझ न पड़े।  और महिलाएं भी स्वस्थ और सुरक्षित रह सकें।

हज़ारों सामाजिक और आर्थिक मुश्किलों का सामना करते हुए, सबसे कम लागत में सैनिटरी नैपकिन बनाने वाली मशीन का अविष्कार उन्होंने कर ही डाला। उनके इस जूनून को देख कर लोग उन्हें पागल भी कहने लगे थे, और एक वक्त ऐसा आया जब उनकी पत्नी ने भी उन्हें छोड़ दिया।

पर उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। उन्होंने  सस्ते सैनिटरी नैपकिन बनाने की बात तो सोची ही थी, साथ में अब वो ऐसा तरीका विकसित करना चाहते थे जिससे नैपकिन बनाने का काम महिलाएं ही सीख जाएं और उन्हें इस काम की अच्छी कीमत भी मिल सके। वो  अपनी  मशीन को IIT मद्रास ले गए। और वहाँ के नेशनल इनोवेशन अवॉर्ड कंपटीशन की 943 मशीनों में मरुगनाथम की मशीन नंबर वन थी

2014 में मुरुगनाथम टाइम्स मैग्ज़ीन की विश्व के 100 प्रभावशाली लोगों की लिस्ट में से एक थे। और उन्हें भारत सरकार की तरफ से साल 2016 में ‘पद्मश्री’ से सम्मानित किया गया है।

एक बार उनसे पूछा गया कि क्या राष्ट्रपति से अवॉर्ड लेना उनकी ज़िंदगी का सबसे सुखद पल था तो उन्होंने इससे इनकार कर दिया। उन्होंने बताया कि सबसे गर्वीला क्षण वो था जब उन्होंने उत्तराखंड के एक ऐसे इलाके में मशीन लगाई जहां पीढ़ियों से किसी ने इतना पैसा नहीं कमया था कि बच्चों को स्कूल भेजा जा सके।

साल भर बाद उनके पास एक महिला का फोन आया जिसने बताया कि अब उसकी बेटी स्कूल जा सकती है,’जहां नेहरू फेल हो गए थे, वहां उनकी मशीन कामयाब हो गई।’

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