इन चार लोगों की मौत की जिम्मेदारी रजनीकांत और कमल हसन लेंगे?

इन चार लोगों की मौत की जिम्मेदारी रजनीकांत और कमल हसन लेंगे?

14 जनवरी को हमारे पुरे देश में मकर संक्राति मनाई, लेकिन इसके अगले दिन तमिलनाडु में जल्लीकट्टू शुरू हो गया, यह वो ही खेल, जहां सांड के सामने आदमी अपनी

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14 जनवरी को हमारे पुरे देश में मकर संक्राति मनाई, लेकिन इसके अगले दिन तमिलनाडु में जल्लीकट्टू शुरू हो गया, यह वो ही खेल, जहां सांड के सामने आदमी अपनी ताकत की आजमाइश करते हैं. और खेल का ‘मजा’ बढ़ाने के लिए सांड को शराब, ड्रग्स भी दिए जाता है. फिर लोग उस सांड से लड़ते हैं. और आसपास खड़े हजारों लोग इस खूनी खेल पर ताली बजाते हैं. कई बार तो बेचारा सांड मारा जाता है. तो कई बार इंसान भी मरते हैं.

अभी दो दिन के भीतर चार लोग की मृत्यु हो चुकी हैं, पहले दिन, यानी 15 जनवरी को एक आदमी की मौत हुई थी. दूसरे दिन, यानी 16 जनवरी को तीन लोगों की मौत हुई. कुल जोड़, चार मौतें. बहुत लोगों ने इस खेल का समर्थन किया था. क्या उनमें से कोई भी आगे आकर इन हत्याओं की जिम्मेदारी ले सकता है?

उम्मीद करते हैं कि ये खबर कमल हसन और रजनीकांत को भी मालूम चली होगी. बाकी जिन सिलेब्रिटीज ने जल्लीकट्टू को ‘संस्कृति’ और ‘परंपरा’ बताते हुए इसकी वकालत की थी, उन सबके भी पास पहुंची होगी. कमल हसन ने तो बकायदा कहा था कि वो जल्लीकट्टू नाम के इस ‘खेल’ के बहुत बड़े फैन हैं. खुद भी कई बार ये खेल चुके हैं. अब उनसे पूछा जाना चाहिए. क्या इन चार मौतों की जिम्मेदारी लेंगे? …

ये कहेंगे कि संस्कृति के नाम पर लोगों का मरना चलता है? क्या संयोग है कि रजनीकांत और कमल हसन अब राजनीति में भी आ गए हैं. रजनीकांत ने अपनी अलग पार्टी बना भी ली. कमल हसन भी 21 फरवरी को अपनी पार्टी बना रहे हैं. कहावत है- जे रोगिया के भावे, वो वैधा फरमावे. ये लोग भी ऐसे ही होंगे. समर्थन के चक्कर में लोगों को खुश करने वाली बातें करेंगे. जैसा कि नेता आमतौर पर करते हैं. जिधर हवा बहती है, उधर बह लेते हैं. स्टैंड लेने से डरते हैं. स्टैंड लेते भी हैं, तो इतना बुरा…

खेल के नाम पर जानवरों के साथ बहुत बुरा सलूक किया जाता है क्या इन पर सरकार की नजर नहीं पड़ती !

वैसे तमिलनाडु में पोंगल मनाते हैं. जल्लीकट्टू इसी जश्न का हिस्सा है. इसको मांजू विरट्टू भी बोलते हैं. इस हिंसक खेल के लिए लोग खासतौर पर सांड पालते हैं….

गांवों में मेला सा माहौल रहता है. जल्लीकट्टू दो शब्दों से बना है- जली और कट्टू. इन शब्दों का मतलब समझिए तो यूं होगा कि सांड के सींग में बंधे हुए सोने/चांदी के सिक्के. जो कि सांड की जीत का इनाम होते हैं. इस ‘खेल’ में लोग सांड से लड़ते हैं. जो लड़ते हैं, उनके लिए ये बहादुरी दिखाने का मौका होता है. जो देखते हैं, उनके लिए मनोरंजन होता है…

सांड चूंकि जानवर है इसीलिए उसकी मर्जी नहीं पूछी जाती. उसे उत्तेजित करने के लिए उसे नशे की पदार्थ दी जाती हैं. इसके बाद मारा-कोंचा जाता है. मानते हैं कि सांड जितना आक्रामक हो, खेल में उतना मजा आता है.

इस मृत्यु दंड को खेल का आयोजन कैसे कहा जा सकता है?

इस खेल के कई नाम हैं. हर नाम में खेल थोड़ा-बहुत बदल जाता है. सांड और उससे होने वाली लड़ाई सबमें कॉमन है. इस खेल के चक्कर में हर साल कई सारे लोग मारे जाते हैं. जानवरों पर जो बीतती है, वो अलग है…

इसी चक्कर में सुप्रीम कोर्ट ने इस खेल पर बैन लगा दिया था. बैन के बाद तमिलनाडु में बवाल हो गया. लगा कि लोगों से उनकी सांस छीन ली गई है. सरकार ने भी उन्हें सहलाने में कोई कसर नहीं छोड़ी. और कमल हसन जैसे कलाकार तो इसकी तारीफ में कसीदे पढ़ रहे थे. ऐसा लग रहा था कि जल्लीकट्टू बंद हो जाने पर तमिलनाडु जी नहीं पाएगा…

वैसे जान गई तो है. दो दिन में चार लोगों की. इसी खेल ने जान ली है उनकी. बाकी कितने जानवर मरे, इसका आंकड़ा है नहीं. मरे होंगे, ये तय है. लेकिन अभी कोई हो-हल्ला नहीं हो रहा. अजीब लोग हैं. जहां बोलना चाहिए वहां चुप रहते हैं. जहां चुप रहना चाहिए, वहां तलवार भांजने लग जाते हैं. इस खुनी खेल को खेल कैसे कहा जाता हैं
इस खुनी खेल में हर साल कई लोगो की जान जाती हैं पर इस रोकने के लिए कोई उपाए नहीं हो पाया हैं।

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