कहानी एक खूबसूरत और जांबाज़ भारतीय राजकुमारी के जासूस बनने की !

कहानी एक खूबसूरत और जांबाज़ भारतीय राजकुमारी के जासूस बनने की !

यह एक सच्ची , जाबांज़ साथ ही भावुक कहानी है, एक युवती नूर इनायत खान की, जो की मैसूर के महान शासक टीपू सुल्तान के राजवंश की राजकुमारी थी। बेहद खूबसूरत

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यह एक सच्ची , जाबांज़ साथ ही भावुक कहानी है, एक युवती नूर इनायत खान की, जो की मैसूर के महान शासक टीपू सुल्तान के राजवंश की राजकुमारी थी। बेहद खूबसूरत और मासूमियत से भरा चेहरा, आंखों की गहराई, वीणा पर थिरकती उंगलियां और रूह तक सीधे पहुंचने वाले सूफियाना कलाम के सुरीले बोल… ये सब नूर इनायत खान के  व्यक्तित्व का ही हिस्सा था, लेकिन नाजियों की तानाशाही और द्वितीय विश्वयुद्ध के शुरू होने की घटना ने प्रिंसेस को अंदर तक झकझोर दिया था। यहीं से उसकी जिंदगी बदल गई और वह विश्व की एक जांबाज जासूस बन गई। सबसे हैरत की बात है कि वह ब्रिटेन की साम्राज्यवाद की नीति की विरोधी होने के बावजूद भी उनके लिए लड़ी। राजकुमारी हजरत नूर-उन-निसा इनायत खान ने द्वितीय विश्वयुद्ध में तानाशाह हिटलर की सेना के खिलाफ बड़े मिशन पर काम करते हुए अपनी जान दे दी।

प्रारंभिक जीवन :-

नूर इनायत का जन्म 1 जनवरी, 1914 को मॉस्को में हुआ था। उनका पूरा नाम “नूर-उन-निशा इनायत खान” है। वे चार भाई-बहन थे,  वे अपने चारो भाई-बहनों में सबसे बड़ी थी। उनके पिता भारतीय और मां अमेरिकी थीं। उनके पिता हजरत इनायत खान 18 वीं सदी में मैसूर राज्य के टीपू सुल्तान के पड़पोते थे, जिन्होंने भारत के सूफीवाद को पश्चिमी देशों तक पहुंचाया था। वे एक धार्मिक शिक्षक थे, जो परिवार के साथ पहले लंदन और फिर पेरिस में बस गए थे। नूर में भी उनके पिता के संगीत की गहरी छाप थी, वो भी संगीत और वीणा में पारंगत थीं।

प्रथम विश्व युद्ध के बाद उनका परिवार मॉस्को से लंदन आ गया था, जहां नूर का बचपन बीता । 1920 में वे फ्रांस चली गई, जहां वे पेरिस के निकट सुरेसनेस के एक घर में अपने परिवार के साथ रहने लगी। पर 1927 में पिता की मृत्यु के बाद उनके ऊपर माँ और छोटे भाई-बहनों की ज़िम्मेदारी आ गई। स्वभाव से शांत, शर्मीली और संवेदनशील नूर संगीत को जीविका के रूप में इस्तेमाल करने लगी और पियानो की धुन पर संगीत का प्रसार करने लगी। पर संगीत से पर्याप्त आय न होने पर उन्होंने कविता और बच्चों की कहानियाँ लिखकर कमाना शुरू कर दिया। साथ ही फ्रेंच रेडियो में नियमित योगदान भी देने लगी। द्वितीय विश्व युद्ध के फैलने के बाद,फ्रांस और जर्मन की लड़ाई के दौरान वे 1940 को अपने परिवार के साथ समुद्री मार्ग से ब्रिटेन के कॉर्नवाल लौट आयीं।

वायु सेना और ख़ुफ़िया विभाग में सफर :-

अपने पिता के शांतिवादी शिक्षाओं से प्रभावित नूर को नजियों के अत्याचार से गहरा सदमा लगा। जब फ्रांस पर नाज़ी जर्मनी ने हमला किया तो उनके दिमाग़ में उसके ख़िलाफ़ वैचारिक उबाल आ गया।  19 नवंबर 1940 को, वे वायु सेना में द्वितीय श्रेणी एयरक्राफ्ट अधिकारी के रूप में शामिल हुईं, जहां उन्हें “वायरलेस ऑपरेटर” के रूप में प्रशिक्षण हेतु भेजा गया।

बाद में नूर को फरवरी 1943 में वायु सेना मंत्रालय में तैनात किया गया। उनके वरिष्ठों में गुप्त युद्ध के लिए उनकी उपयुक्तता पर मिश्रित राय बनी और यह महसूस किया गया कि अभी उनका प्रशिक्षण अधूरा है, किन्तु फ्रेंच की अच्छी जानकारी और बोलने की क्षमता ने स्पेशल ऑपरेशंस ग्रुप का ध्यान उन्होने अपनी ओर आकर्षित कर लिया,फलत: उन्हें वायरलेस आपरेशन युग्मित अनुभवी एजेंटों की श्रेणी में एक एक वांछनीय उम्मीदवार के तौर पर प्रस्तुत किया गया। फिर वह बतौर जासूस काम करने के लिए तैयार की गईं और 16-17 जून 1943 में उन्हें जासूसी के लिए रेडियो ऑपरेटर बनाकर फ्रांस भेज दिया गया। उनका कोड नाम ‘मेडेलिन’ रखा गया। वे भेष बदलकर अलग-अलग जगह से संदेश भेजती रहीं। जर्मन सीक्रेट पुलिस ‘गेस्टापो’ इन इलेक्ट्रॉनिक सिग्नल्स की पहचान और इनके स्रोत को पकड़ सकती थी। उनकी ख़तरनाक भूमिका को देखते हुए लोग मानते थे कि फ्रांस में वह छह हफ्ते से अधिक जीवित नहीं रह पाएंगी।

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान नूर विंस्टन चर्चिल के विश्वसनीय लोगों में से एक थीं। उन्हें सीक्रेट एजेंट बनाकर नाजियों के कब्जे वाले फ्रांस में भेजा गया था। उन्होंने जर्मन पुलिस की नाक के नीचे अपना ऑपरेशन जारी रखा।  वह बड़ी सफलता के बहुत करीब थीं, पर उनके किसी सहयोगी की बहन ने जर्मनों के सामने उनका राज खोल दिया था।  इस कारण जर्मन पुलिस उन तक आसानी से पहुंच गई, पुलिस ने उन्हें चारों तरफ से घेर लिया था। उनके पास सरेंडर करने के सिवा कोई दूसरा विकल्प नहीं था, पर नूर ने ऐसा नहीं किया। वह शेरनी की तरह जर्मनी पुलिस के लोगों पर टूट पड़ी। उन्होंने हाथापाई शुरू कर दी, तकरीबन घंटे भर की मशक्कत के बाद अंतत: उन्ह पर काबू पा लिया गया और फिर उन्हें जेल में डाल दिया गया। उनको एक ख़तरनाक क़ैदी की तरह जेल में रखा गया।

जेल के अंदर उनको हर तरह से प्रताड़ित किया गया, ताकि वह ब्रितानी ऑपरेशन के बारे में सब बता दें। लेकिन उनके हौसले को हिटलर के सैनिक नहीं तोड़ पाये। उन्होंने मार खाई, भूखी रहीं, लेकिन अपनी फ़ौज से गद्दारी नहीं की। उन्होंने दो बार जेल से भागने की कोशिश की, लेकिन विफल रहीं।

नाजी नूर का असली नाम तक नहीं पता कर पाए थे। कैदी के रूप में एक साल गुजारने के बाद उन्हें दक्षिणी जर्मनी के एक यातना शिविर में भेज दिया गया। वहां उन्हें नए सिरे से प्रताड़ित किया गया। उन्हें दस महीने तक घोर यातनायें दी गईं, फिर भी उनसे कोई सूचना निकलवा न पाए।

11 सिंतबर, 1944 को उन्हे और उसके तीन साथियों को जर्मनी के डकाऊ प्रताड़ना कैंप ले जाया गया, जहां 13 सितंबर, 1944 की सुबह चारों के सिर पर गोली मारने का आदेश सुनाया गया। यद्यपि सबसे पहले नूर को छोडकर उनके तीनों साथियों के सिर पर गोली मार कर हत्या की गई। तत्पश्चात नूर को डराया गया कि वे जिस सूचना को इकट्ठा करने के लिए ब्रिटेन से आई थी, वे उसे बता दे। लेकिन उन्होंने कुछ नहीं बताया, अंतत: उनके भी सिर पर गोली मारकर हत्या कर दी गई। जब उन्हें गोली मारी गई, तो उनके होठों पर शब्द था -“फ्रीडम इस उम्र में इतनी बहादुरी कि जर्मन सैनिक तमाम कोशिशों के बावजूद उनसे कुछ भी नहीं जान पाए, यहां तक कि उनका असली नाम भी नहीं। उसके बाद सभी को शवदाहगृह में दफना दिया गया। मृत्यु के समय उनकी उम्र सिर्फ 30 वर्ष थी।

सम्मान :-

ब्रिटेन की सरकार ने 2012 में नूर के बलिदान को सम्मान देते हुए लंदन में उनकी प्रतिमा स्थापित करवाई। ब्रिटेन की महारानी एलिजाबेथ की बेटी ऐन ने भारतीय मूल की राजकुमारी की मूर्ति का अनावरण करते हुए सम्मान व्यक्त किया था। ब्रिटिश सरकार ने नूर इनायत खान को अपना सर्वोच्च नागरिक सम्मान जॉर्ज क्रास दिया। फ्रांस ने भी अपने सर्वोच्च नागरिक सम्मान-क्रोक्स डी गेयर से उन्हें नवाजा।
भारतीय मूल की पत्रकार श्रावणी घोष ने भारतीय राजकुमारी पर एक किताब ‘स्पाई प्रिसेंस’ लिखी है तथा हॉलीवुड में इन पर ‘Enemy of the Reich’ नाम से फिल्म बन चुकी है।

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